आजादी के 80 साल बाद भी सड़क के लिए तरस रहे दो गांव, कलेक्ट्रेट पहुंचा आक्रोश न पंचायत ने सुनी, न जनप्रतिनिधियों ने दिया ठोस आश्वासन, ग्रामीण बोले—अब सड़क नहीं तो आंदोलन और चुनाव बहिष्कार
रतलाम। देश आजादी का 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है। सरकारें गांव-गांव विकास पहुंचाने और ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के विस्तार के दावे कर रही हैं, लेकिन रतलाम शहर से महज करीब 10 किलोमीटर दूर मुदंडी और सरवनी जागीर के ग्रामीण आज भी एक अदद सड़क के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं। वर्षों से सड़क की मांग कर रहे ग्रामीणों का सब्र अब जवाब देने लगा है। गुरुवार को बड़ी संख्या में ग्रामीण कांग्रेस नेताओं के साथ कलेक्ट्रेट पहुंचे और प्रशासन के सामने अपनी पीड़ा रखते हुए सड़क निर्माण की मांग उठाई।
ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी उनके गांव तक बेहतर सड़क नहीं पहुंच पाई है। बरसात के दिनों में स्थिति बेहद खराब हो जाती है। रास्ता कीचड़ और गड्ढों में तब्दील हो जाता है, जिससे ग्रामीणों का मुख्य मार्ग तक पहुंचना तक मुश्किल हो जाता है। सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और गर्भवती महिलाओं को उठानी पड़ती है।

बारिश में गांव का संपर्क हो जाता है मुश्किल
ग्रामीणों के मुताबिक बारिश के दौरान सड़क की हालत इतनी खराब हो जाती है कि वाहन लेकर गांव तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। स्कूल जाने वाले बच्चों को भी इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि आपात स्थिति में 108 एंबुलेंस तक गांव के अंदर नहीं पहुंच पाती। ऐसे में मरीजों को चारपाई या अन्य साधनों से मुख्य मार्ग तक ले जाना पड़ता है।
ग्रामीणों ने एक बेहद गंभीर घटना का जिक्र करते हुए बताया कि कुछ समय पहले एक गर्भवती महिला को गांव से मुख्य मार्ग तक ले जाया जा रहा था। खराब रास्ते के कारण उसे समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा सका और रास्ते में ही प्रसव की स्थिति बन गई। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क सिर्फ सुविधा का मुद्दा नहीं, बल्कि अब उनके लिए जिंदगी और मौत से जुड़ा सवाल बन चुकी है।
वर्षों से आवेदन, लेकिन सड़क के नाम पर सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने सड़क निर्माण के लिए कई बार ग्राम पंचायत से लेकर जनप्रतिनिधियों और कलेक्टर कार्यालय तक आवेदन दिए। क्षेत्रीय विधायक मथुरालाल डामर से भी कई बार सड़क निर्माण की मांग की गई, लेकिन ग्रामीणों के मुताबिक उन्हें अब तक कोई ठोस आश्वासन या निर्माण की स्पष्ट कार्ययोजना नहीं मिली।
ग्रामीणों में इस बात को लेकर भी नाराजगी है कि चुनाव के समय नेता गांव-गांव पहुंचकर विकास के वादे करते हैं और वोट मांगते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ग्रामीणों की समस्याएं पीछे छूट जाती हैं।
अब आश्वासन नहीं, सड़क चाहिए
कलेक्ट्रेट पहुंचे ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि अब वे सिर्फ आवेदन और आश्वासन के भरोसे नहीं बैठेंगे। ग्रामीणों ने प्रशासन से सड़क निर्माण को लेकर समयबद्ध कार्रवाई की मांग की है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू नहीं की गई तो वे रतलाम-झाबुआ रोड स्थित मुदंडी चौराहे पर अनिश्चितकालीन अनशन और सड़क बंद आंदोलन शुरू करेंगे। इसके साथ ही आगामी चुनावों में मतदान के पूर्ण बहिष्कार की चेतावनी भी दी गई है।
विकास के दावों के बीच बड़ा सवाल
एक तरफ प्रदेश और केंद्र सरकार गांवों को सड़कों से जोड़ने और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास की बात करती है, वहीं दूसरी ओर जिला मुख्यालय के इतने करीब बसे गांवों के लोग वर्षों से सड़क के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं। सवाल यह है कि जब शहर से महज कुछ किलोमीटर दूर ग्रामीणों को आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा के लिए आंदोलन की चेतावनी देनी पड़ रही है, तो विकास के दावों की जमीनी हकीकत क्या है?
अब देखना यह है कि ग्रामीणों की इस पीड़ा पर प्रशासन कब गंभीरता दिखाता है और कब इन गांवों को सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि एक ऐसी सड़क मिलती है जिस पर बच्चे स्कूल जा सकें, मरीज समय पर अस्पताल पहुंच सकें और बारिश के दिनों में गांव का संपर्क जिला मुख्यालय से न टूटे।
