मुंह पर मक्खी बैठ जाए तो लोग तुरंत हटा देते हैं, लेकिन शहर कांग्रेस अध्यक्ष की नींद 5 दिन बाद खुली! अब डोसीगांव मल्टी पर राजनीति क्यों?
रतलाम। डोसीगांव पीएम आवास की मल्टी का मामला पिछले करीब दस दिनों से पूरे शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। नगर निगम ने पहले नोटिस जारी किए, फिर समय-सीमा तय की और आखिरकार फ्लैट खाली कराने की कार्रवाई तक शुरू कर दी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान मल्टी के रहवासी लगातार प्रशासन के चक्कर लगाते रहे, धरना-प्रदर्शन हुए, जनप्रतिनिधियों से मुलाकात हुई और मामला राजनीतिक रूप भी लेता गया।लेकिन हैरानी की बात यह है कि विपक्ष की भूमिका निभाने वाली शहर कांग्रेस की सक्रियता तब दिखाई दी, जब कार्रवाई अपने अंतिम दौर में पहुंच चुकी थी। अब शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मुद्दे पर अपनी बात रख रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जब नोटिस देने की बात चल रही थी या दिए जा रहे थे, ओर रहवासी मदद की गुहार लगा रहे थे और जब प्रशासन कार्रवाई की तैयारी कर रहा था, तब शहर कांग्रेस कहां थी?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब 31 जुलाई को नोटिस दिए गए, जब रहवासी प्रशासन से राहत की गुहार लगा रहे थे, जब निगम कार्रवाई की तैयारी कर रहा था और जब पूरा शहर इस मुद्दे पर चर्चा कर रहा था, तब शहर कांग्रेस की आवाज़ क्यों नहीं सुनाई दी? यदि शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा वास्तव में प्रभावित परिवारों के साथ खड़े रहने की बात कर रहे हैं तो उन्हें शुरुआत से इस लड़ाई का हिस्सा बनना चाहिए था।

राजनीति में विपक्ष की भूमिका जनता के मुद्दों को समय रहते उठाने की होती है, न कि तब सामने आने की, जब अधिकांश कार्रवाई पूरी हो चुकी हो। यदि शहर कांग्रेस को वास्तव में मल्टी के रहवासियों की चिंता थी, तो अंतिम दिन भी पहुंचकर इस मामले में हस्तक्षेप कर सकती थी। लेकिन यहां कांग्रेस नेता पारस सकलेचा और कुछ लोग पहुंचे। ओर विरोध दर्ज कराया।लेकिन शहर अध्यक्ष का पद लिए बैठे शांतिलाल वर्मा गायब रहे। वही प्रेस कांफ्रेंस करके कांग्रेस शहर अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा ने बयान जारी किया कि हम संपर्क में थे। पीड़ित हितग्राहियों के मदद मांगने का इंतजार कर रहे थे, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि पूरे घटनाक्रम के दौरान वे सामने क्यों नहीं आये। खुद कोई पहल क्यों नहीं की।

शहर की राजनीति पर नजर रखने वाले लोगों का भी मानना है कि शहर कांग्रेस अध्यक्ष शांतिलाल वर्मा अक्सर जनहित के मुद्दों पर देर से सक्रिय नजर आते हैं। शहर से जुड़े कई अहम मुद्दों पर भी उनकी प्रतिक्रिया काफी विलंब से सामने आती रही है।
कहावत है कि "मुंह पर मक्खी रेंग जाए तो इंसान उसे तुरंत हटा देता है।" लेकिन डोसीगांव मल्टी के मामले में ऐसा लगता है कि कांग्रेस को यह एहसास होने में भी कई दिन लग गए कि शहर में एक बड़ा मुद्दा चल रहा है। अब सवाल जनता पूछ रही है—क्या यह संवेदनशीलता है या फिर केवल राजनीतिक औपचारिकता?

दरअसल, जावरा रोड स्थित शिवशंकर कॉलोनी और प्रकाश नगर स्लम बस्ती के रहवासियों का प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत डोसीगांव में पुनर्वास किया गया था। 396 हितग्राहियों की सूची स्वीकृत हुई। हितग्राहियों से 20 हजार रुपये मार्जिन मनी जमा कराई गई, जिसमें 10 हजार रुपये विधायक फाउंडेशन की ओर से दिए गए थे, जबकि शेष 1.80 लाख रुपये पंजाब नेशनल बैंक के ऋण के माध्यम से जमा किए जाने थे।
नगर निगम का दावा है कि पिछले छह वर्षों में 208 हितग्राहियों को छह बार नोटिस दिए जा चुके हैं। निगम का यह भी कहना है कि अवैध बिजली और पानी कनेक्शनों से लाखों रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ और कनेक्शन काटने के बाद भी दोबारा चोरी से कनेक्शन लिए गए। दूसरी ओर, रहवासियों ने निगम कर्मचारियों पर महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के साथ मारपीट और अभद्रता के आरोप लगाए, जिनके वीडियो भी सामने आए।
इन सबके बीच अब कांग्रेस की सक्रियता कई सवाल खड़े कर रही है। विपक्ष की भूमिका केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि जनता के मुद्दों को समय रहते उठाने की भी होती है। जब नोटिस से लेकर बेदखली की कार्रवाई तक पूरा घटनाक्रम सबके सामने होता रहा, तब कांग्रेस की चुप्पी और अब अचानक सक्रियता राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई है।
कहावत है कि "मुंह पर मक्खी रेंग जाए तो इंसान उसे तुरंत हटा देता है।" लेकिन डोसीगांव मल्टी के मामले में कांग्रेस की प्रतिक्रिया तब आई, जब कार्रवाई लगभग पूरी हो चुकी थी। अब यह जनता तय करेगी कि यह देर से जागी संवेदनशीलता है या फिर देर से शुरू हुई राजनीति।
